वो आखरी रात!

वो आखरी रात!

Wo Akhri Raat

वो घर जो अपना ना होकर भी अपना था,
जहा हर पल मेरे उस यारा के साथ मेरा अपना था,
जहा हम कभी साथ रहकर भी खुद का साथ जीते,
और कभी एक दूजे संग बिताये पल संजोते,
वो घर जो अपना ना होकर भी अपना था।
सवेरे जहा हमारे होते चाय, कॉफ़ी और गीतों के चुस्की से,
शाम ढलती लबों की चुप्पी से,
यादों के इस पिटारे मे हमने संजोई अनगिनत यादें एक दूजे संग,
ऐ घर तू नहीं जानता तूने दिए हमे कितने हसीन पल,
वो घर जो अपना ना होकर भी अपना था।
शुरवात करि थी नए दौर की,
हर मोड़ पर एक अजीब हलचल थी,
कारवां कुछ ऐसा अनोखा रहा ये,
ज़िन्दगी का फलसफा बस बनता चला गया,
वो घर जो अपना ना होकर भी अपना था।
आज आखिर वो वक़्त आ ही गया,
जब हमे उस घर को आखरी अलविदा कहना पड़ा,
मन है थोड़ा भारी सा इस विरह से,
पर जानता है बंधा रहेगा ये खूबसूरत गिरह हमेशा,
वो घर जो अपना ना होकर भी अपना था।

-शिखा जैन